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प्रेम की सार्थकता -“valentine contest”

Posted On: 9 Feb, 2011 में

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प्रेम क्या है? प्रेम किसे कहते हैं? इसकी शुरुआत कहाँ से होती है ? इस विषय मे सबके अपने अपने विचार हैं | हमे प्रेम की कई प्रकार की परिभाषाएँ सुनने को मिलती हैं, लेकिन सभी परिभाषाओं का सार एक ही होता है|

मेरे अनुसार –“प्रेम दो दिलों का मेल है जिसमें दोनों ओर से एक दूसरे के प्रति ईमानदारी , कर्तव्यनिष्ठा , त्याग, सहानुभूति तथा दुखो मे भागीदारी की निःस्वार्थ भावना हो| परंतु मै (अहं) एवं छलकपट की भावना कदापि न हो| यही सच्चा प्यार है |”

आज प्रेम शब्द का प्रयोग अत्यंत संक्षिप्त हो गया है | इसे हम प्रायः प्रेमी व प्रेमिका के मध्य उत्पन्न प्रेम से ही लगाते है | जबकि इसके भी अनेक रूप है| माता-पुत्र,पिता-पुत्र, व भाई-बहन आदि का प्रेम भी इसकी श्रेणी मे आता है| चूंकि “valentine contest” चल रहा है, इसलिए मै प्रेमी व प्रेमिका के प्रेम का ही वर्णन करूंगा|

प्रेम की उत्पत्ति वैसे तो दोस्ती का ही परिणाम है| यदा कदा जीवन के किसी मोड पर किसी अजनबी से हमारी टक्कर हो जाती है| यदि उसकी भावनाएं हमें भा जाती है तथा उसके और अपने विचार आपस मे मेल खाते है तो संभवतः उसकी ओर हम दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं| अगर यह दोस्ती हम उम्र के समलैंगिक व्यक्ति से हो तो यह दोस्ती, दोस्ती  ही बनी रहती है| और यह हम उम्र के विषमलैंगिक व्यक्ति से हो तो दोस्ती की जटाएँ बढ़कर प्यार के वटवृक्ष का रूप ले लेती हैं|

समान्यतः हम प्रेम की तुलना प्रेमिका की बाह्य अर्थात शारीरिक सुंदरता एवं आकर्षण से करते हैं| परंतु यह भावना किसी पक्षता के कारण नहीं है, बल्कि हमारी विचारों की अपरिपक्वता व मानसिक भ्रमता के कारण है| जहां तक मेरा विचार है सार्थक प्यार तन से नहीं बल्कि मन से होता है तथा इसमे वासना का स्थान कतई नहीं होता| प्रेमी व प्रेमिका को उनके मध्य प्यार का एहसास होने के कारण दोनों मे दूरियाँ मिटती हैं| और वे एक दूसरे के इतना करीब आजते हैं, कि मेरे विचार से दुनिया मे कोई भी रिस्ता इतना नजदीकी व मिलनसार नहीं होता, जितना की एक प्रेमी व प्रेमिका का होता है|

वह व्यक्ति जो अपनी प्रेमिका की बाह्य सुंदरता से मदमस्त रहता है एवं शारीरिक सुंदरता वी वशीभूत होकर अपने प्रेम की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है , अर्थात उसकी सुंदरता को ही अपने प्रेम का आधार मानता है| ऐसे प्रेमी की प्रेम की अग्नि उस समय क्षीण हो जाती है, जब उसकी प्रेमिका बुढ़ापे की कैद मे जकड़ जाती है या फिर उस प्रेमिका से भी अधिक सुंदर कोई दूसरी उसके जीवन के दरवाजे पर दस्तक दे जाती है|

अतः स्थायी एवं सार्थक प्रेम के लिए वास्तविक या आंतरिक सौंदर्य आवस्यक है| निष्कपट और सुदृढ़ मन, सुंदर विचार शांत  इच्छाए  व त्याग एवं समर्पण की भावना  अखंड एवं अबाध  प्रेम को जन्म देते हैं और इन सब से मिलकर बना प्रेम स्थायी और अंततः सफल होता  है|

सुंदर आकृति, शारीरिक सौंदर्य सच्चे प्यार के अंग हो सकते हैं पर अनिवार्य नहीं| वास्तविक प्रेम के लिए नैतिक गुण आवश्यक हैं| नैतिक व सामाजिक गुणो के अभाव मे किसी के प्रेम को प्रेम नहीं कहा जा सकता है|

आजकल “लव ऐट फ़र्स्ट साइट” शब्द बहुत प्रसिद्ध है| महानुभावों का कहना है की प्यार किसी से पहली नज़र मे ही हो जाता है| मेरी नज़र मे ऐसा प्यार घृणातुल्य है और इसे सच्चे प्यार का दर्जा नहीं दिया जा सकता है, क्योकि यह पूर्णतः शारीरिक सुंदरता पर आधारित है जो की अल्पकालिक है| एक दूसरे भावनाओं  को पूर्णतः समझे बिना हम सच्चा प्यार कैसे कर सकते हैं?

यूं तो दुनिया मे अनेक लोगों  को प्यार मिल जाता है, अनेकों के बगीचों मे प्यार के फूल खिल जाते हैं| पर दुनिया मे सबसे भाग्यशाली वही होता है, जिसे सच्चा प्यार मिलता है|

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88 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

charchit chittransh के द्वारा
February 21, 2011

दीपक जी ,अति सुन्दर प्रस्तुति !वधाई ! व्यक्तिगत रूप से मैं आपके इस विचार का पूरी तरह समर्थन करता हूँ की पहली नजर का प्यार कम से कम उस समय {होते समय }केवल दैहिक आकर्षण से अधिक कुछ नहीं होता ऐसे प्यार का सफल होना कुछ अरेंज मैरिज के सफल होने जैसा है .

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 21, 2011

    महोदय जी! मुझे खुशी है की आप मेरे विचारों से सहमत हैं! आपकी प्रतिकृया के लिए बहूत बहुत धन्यवाद!!

shab के द्वारा
February 18, 2011

bahut khub farmaya hai janab. prem ki bahut acchi rachna hai.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 18, 2011

    धन्यवाद महोदया जी!

brajmohan sharad के द्वारा
February 17, 2011

दीपक जी , अच्छा लेख….बधाई ….. किसी फिल्म का गीत याद आ रहा है ….. सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो …. बिरजू ,आगरा

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 17, 2011

    महोदय जी! मुझे भी कुछ प्रेम भरी पंक्तियाँ याद आ रही हैं——————– ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन! जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन!!

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 17, 2011

    ऐसे ही अपना आशीर्वाद बनाए रखे! आपकी प्रतिकृया के लिए बहूत बहुत धन्यवाद!!

tejrajprajapat के द्वारा
February 17, 2011

प्रेम की जो आपने परिभाषा दी है वो वास्तव में सही है आपको बहुत बहुत बधाई

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 17, 2011

    महोदय जी! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

anuj के द्वारा
February 17, 2011

स्थायी एवं सार्थक प्रेम के लिए वास्तविक या आंतरिक सौंदर्य आवस्यक है| निष्कपट और सुदृढ़ मन, सुंदर विचार शांत इच्छाए व त्याग एवं समर्पण की भावना अखंड एवं अबाध प्रेम को जन्म देते हैं और इन सब से मिलकर बना प्रेम स्थायी और अंततः सफल होता है| दीपक भाई! बहुत अच्छे विचार आपने लिखे हैं! बधाई!

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 17, 2011

    अनुज जी! आपको मेरे विचार पसंद आए , यह जानकार मेरा मन हर्षित हो गया!! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

Amit kr Gupta Hajipur के द्वारा
February 15, 2011

प्रेम क्या है? प्रेम किसे कहते हैं? इसकी शुरुआत कहाँ से होती है ? इस विषय मे सबके अपने अपने विचार हैं | हमे प्रेम की कई प्रकार की परिभाषाएँ सुनने को मिलती हैं, लेकिन सभी परिभाषाओं का सार एक ही होता है| मेरे अनुसार –“प्रेम दो दिलों का मेल है जिसमें दोनों ओर से एक दूसरे के प्रति ईमानदारी , कर्तव्यनिष्ठा , त्याग, सहानुभूति तथा दुखो मे भागीदारी की निःस्वार्थ भावना हो| परंतु मै (अहं) एवं छलकपट की भावना कदापि न हो| यही सच्चा प्यार है |” अच्छे सवाल और जवाब ,बधाई के पात्र

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 16, 2011

    बंधु अमित जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!! दीपक

sumityadav के द्वारा
February 14, 2011

बहुत खूब दीपकजी। बाहरी सुंदरता और आकर्षण से परे होकर हम सोच पाएंगे उस दिन हम सही मायनों में प्रेम की सुंदरता को देख पाएंगे। बहुत ही सार्थक लेख। शब्दों का बहुत ही खूबसूरत चयन। आपके लेखन में गजब की लय है। वेलेंटाइन कांटेस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 14, 2011

    सुमित जी! आपको मेरा लेख पसंद आया, यह जानकार मेरा मन हर्षित हो गया!! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

Versha के द्वारा
February 14, 2011

nice thought

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 14, 2011

    वर्षा जी! मुझे खुशी है की आप मेरे विचारों से सहमत है! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

nishamittal के द्वारा
February 14, 2011

दीपक जी आज कल का love at first sight प्राय बाह्य सुन्दरता पर ही होता है.अपवाद हो सकते हैं.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 14, 2011

    अदरणीय निशा जी! सही कहा आपने, “लव ऐट फ़र्स्ट साइट” के अपवाद हो सकते है? क्योकि कभी कभी आँखों को सच भी नज़र आ जाता है! पर हमेसा नहीं! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

    aditya के द्वारा
    February 16, 2011

    दीपक भाई! ये बात तो बिल्कुल सत्य है कि “लव ऐट फ़र्स्ट साइट” का प्रेम तो सुन्दरता पर आधारित है लेकिन ये बात भी पूर्णतः सत्य है कि सायद हमारी नजरो ने सही इन्सान को पहचान लिया हो!

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 16, 2011

    अदित्य जी! जैसा की मै पहले ही कह चुका हूँ की हमारी नजरे भी तो धोखा खा सकती हैं! सच्चा प्यार तो दिल से होता है, जब तक हम एक दूसरे को ठीक से पहचानेंगे नहीं तब तक हम किसी से सच्चा प्यार कैसे कर सकते है? आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!! दीपक

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 13, 2011

सुन्दर आलेख पर बधाई स्वीकार करें|

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    वाहिद जी! आपको मेरा लेख पसंद आया, यह जानकार मेरा मन अति प्रसन्न हो गया!! इसी तरह अपनी दया बनाए रखें! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

umesh kumar के द्वारा
February 13, 2011

दीपक जी! प्रेम की sarthakta ko achchhe dhang se prastut kiya hai. Sach me sachcha pyar jise mil jae, wo hi sabse bhaagyashali hota hai .

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    उमेश जी!  मुझे खुशी है की आपको मेरे विचार पसंद आए! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक 

Nish aik bevkoof के द्वारा
February 13, 2011

स्थायी एवं सार्थक प्रेम के लिए वास्तविक या आंतरिक सौंदर्य आवस्यक है|  बहुत सच्ची और गहरी बात कही है साहू भाई…अच्छी रचना बधाई हो.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    निश जी!  मुझे खुशी है की आपको मेरे विचार पसंद आए! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

rahul kumar (Bijupara,Ranchi) के द्वारा
February 12, 2011

दीपक जी, मैंने आपकी रचना पढ़ी…. वैसे मेरे ये निजी विचार हैं की कोई लड़का या लड़की मन से चाहे कितना भी ख़ूबसूरत क्यूँ ना हो…… अगर वो शरीर से बदसूरत है…..तो हम उसे प्यार नहीं कर सकते हैं…..उसे अपनी बीवी या पति नहीं बना सकते हैं…. हाँ…….मैं इस बात से जरुर सहमत हूँ की सिर्फ शारीरिक सुंदरता से हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए…..

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    राहुल जी! वैसे आपके विचार भी बहुत सुंदर हैं, मुझे पसंद आए| लेकिन क्या ऐसा नहीं हो सकता है की कुरूप को कूरूप से सच्चा प्यार हो जाए, तब तो उनकी जोड़ी जम सकती है!

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    आप मेरी बातों से सहमत है यह बात जानकार मुझे खुशी है! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

    charchit chittransh के द्वारा
    February 21, 2011

    जब मन की सुन्दरता देखने की दृष्टी मिल जाती है तब तन का सौन्दर्य मायने नहीं रखता लेकिन मन का सौन्दर्य देखने की दृष्टी भी केवल निर्मल मन वालों के पास ही होती है .

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 21, 2011

    “मन का सौन्दर्य देखने की दृष्टी भी केवल निर्मल मन वालों के पास ही होती है” सुंदर विचार हैं आपके! चित्त्रांश जी!

Mala Srivastava के द्वारा
February 12, 2011

बहुत सही कहा है आपने ………….”"समान्यतः हम प्रेम की तुलना प्रेमिका की बाह्य अर्थात शारीरिक सुंदरता एवं आकर्षण से करते हैं| परंतु यह भावना किसी पक्षता के कारण नहीं है, बल्कि हमारी विचारों की अपरिपक्वता व मानसिक भ्रमता के कारण है|”" …….. अच्छा लेख है, आज के प्रेम क परिद्रश्य क अनुसार ही वर्णन है !

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    माला जी! अखंड व स्थायी प्रेम के लिए आंतरिक सौंदर्य आवश्यक है! इसके बिनप्रेम सिर्फ क्षणिक ही हो सकता है! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

February 12, 2011

दीपक जी, आपने प्रेम शब्द को व्यापक अर्थों में लिया हॆ.सुंदरता तन में नहीं,मन में होनी चाहिए.जिसका मन सुंदर हॆ-उसका हर किसी से प्रेम होता हॆ.अति-सुंदर लेख के लिए धन्यवाद!इसी तरह आगे बढते रहें.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    अदरणीय विनोद जी! अखंड व स्थायी प्रेम के लिए आंतरिक सौंदर्य आवश्यक है! इसके बिनप्रेम सिर्फ क्षणिक ही हो सकता है! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

डा.. एस शंकर सिंह के द्वारा
February 12, 2011

प्रिय दीपक जी, सप्रेम नमस्कार. मेरी समझ से सच्चे प्यार के लिए आपसी समझ, एक जैसी सोच, एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करना, पारस्परिक सहिष्णुता परम आवश्यक है. बाक़ी चीज़ें बाद में आती हैं. ऐसा प्यार ही चिरस्थायी होता है, अन्यथा यह ‘ मेकेनिकल एक्ट ‘ बन जाता है.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    सही कहा अपने महोदय जी! प्रेम करने करने से पहले प्रेम को समझना आवस्यक है!  आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

rktelangba के द्वारा
February 12, 2011

बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा दीपक जी आपने .. यह सच है की आज के युग में फ़िल्मी प्यार वास्तविक प्यार पर हावी हो चुका है. फिल्मो में नायक को क्यों सब से खुबसूरत लड़की से ही प्यार होता है ? किसी बदसूरत लड़की को कभी प्यार करते देखा है फिल्मो में ? आज भी वही बात हो रही है. भौतिक चमक दमक ही हावी है हर तरफ…

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    सही कहा आपने महोदय जी! आज भौतिक चमक दमक ही हावी है हर तरफ… कहीं हम इसके बस मे और न हो जाएँ हमे ही अपनी सोच बदलनी चाहिए! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
February 12, 2011

श्री दीपक जी ,शायद अपने अपनी छोटी उम्र में प्यार के वास्तविक अर्थ को बहुत बारीकी से समझा है आप बधाई के पात्र हैं. जीवन में आप सफलता की सीढियों पर बहुत आगे जाने की क्षमता रखते हैं सत्य शील अग्रवाल

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    सब आप जैसे बड़ों का आशीर्वाद है! अदरणीय महोदय जी!नअर्ण मई कहाँ? आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

jlsingh के द्वारा
February 12, 2011

निखिल जी मैं आपके विचारों से सहमत हूँ.प्रेम मात्र शरीर से नहीं आत्मा या पूरी श्रृष्टि के साथ की जा सकती हा. तभी ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का मंत्र सिद्ध हो सकता है..आपके सुन्दर विचारों के लिए धन्यवाद्!.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 18, 2011

    प्रेम मात्र शरीर से नहीं आत्मा या पूरी श्रृष्टि के साथ की जा सकता है!. तभी ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का मंत्र सिद्ध हो सकता है!! सुंदर विचार हैं आपके महोदय जी!

jlsingh के द्वारा
February 12, 2011

प्रिय दीपक जी, मेरा मानना है की अगर प्यार को किसी सीमा में न बाँधें तो यह समग्र संसार प्यार का भण्डार है! और यहाँ अगर हम आपस में प्रेम के साथ रहे तो फिर विवाद या झगडा के लिए फिर सामग्री न रहेगी. पर अज जो सुनते है या देखते है की अमुक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका की जान लेकर खुद भी आत्मा हत्या कर बैठा. इसे क्या आप प्रेम कहेंगें.? पिता पुत्र का और पुत्र पिता का भाई भाई का हत्यारा बना बैठा है. इसे प्रेम या धर्म का नाम दे सकते हैं.? सभी व्द्वानों ने अपने अपने ढंग से प्रेम को परिभाषित करने की, उसे सीमा में बाँधने की कोशिश की है जबकि प्रेम सीमा से परे है ऐसा मेरा मानना ही. आदर के साथ.– जवाहर.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    महोदय सिंह जी! विचार तो सुंदर प्रस्तुत किए है आपने! एक प्रेमी जो इकतरफा प्रेम मे अपनी प्रेमिका की जान लेकर खुद आत्महत्या कर लेता है इसे उसका पागलपन या दीवानापन ही कह सकते हैं! और रही बात पिता पुत्र या संबंधियों की हत्या की तो ये कार्य बिलकुल वैसे ही है जैसे एक गंदी मछली सारे तालाब को  गंदा कर देती है उसी प्रकार कुछ लोग इन रिश्तों को कलंकित कर देते हैं! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 13, 2011

    और महोदय जी ये रिश्ते तभी तक सार्थक हैं जब तक इनमे प्रेम रहता है| जब यह प्रेम खत्म हो जाता है तब सिर्फ नफरत ही बचती है!

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 11, 2011

साहू जी….. अति सुंदर प्रेम पर आपके उपरोक्त विचार निश्चित ही उत्तम कहे जा सकते हैं…. सुंदर …. आभार

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    हिमांशु जी! मुझे खुशी है की आपको मेरे विचार पसंद आए! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

omprakash pareek के द्वारा
February 11, 2011

दीपकजी, सुन्दर लेख. प्रेम शब्द का अद्भुत विश्लेषण. व्यापक फलक जिसमें प्रेम के अनेक आयामों पर मय-मिसाल टिप्पणी. आपके शब्दों में वाकई में शक्ति है. सरस्वती की कृपा कहिये. oppareek43

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    पारिक जी!  मुझे खुशी है की आपको मेरे शब्द अच्छे लगे! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

baijnathpandey के द्वारा
February 11, 2011

कभी-कभी लव ऐट फर्स्ट साईट भी सच हो सकता है ……क्योंकि आँखें भी बहुत कुछ बोलती है अच्छी रचना ……बधाई

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    बैजनाथ जी! आपका कहना सत्य है पर कभी कभी आखे भी धोखा खा सकती हैं! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

Amita Srivastava के द्वारा
February 11, 2011

बहुत अच्छा लेख ,सच्चा प्यार नसीब से मिलता है।

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    अमिता जी! सही कहा आपने सच्चा प्यार नसीब से मिलता है। पर हमे भी सच्चे प्यार मे कुछ कर्तव्य निभाने होते हैं! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

nikhil के द्वारा
February 11, 2011

प्रिय दीपक जी.. आपके विचार पढ़कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई .. अज एक तरफ जहा बाजारवादी भौतिकवादी दृष्टिकोण आज की युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले चूका है और हर चीज की परिभाषाये बदलती चली जा रही है.. वह आपने प्रेम को एक अनुबंध न मानकर प्रकृति प्रदत्त अनमोल उपहार मान कर उसकी व्याख्या की है … जिस तरह वाह्य खूबसूरती स्थाई नहीं होती वैसे ही वाह्य सुन्दरता पर आश्रित प्रेम स्थाई नहीं हो सकता .. वह तो अपने आप समय के साथ नष्ट हो जायेगा .. सच्चा प्रेम वही है जो व्यक्ति को पूरी समष्टि के साथ प्रेम व्यवहार करना सिखाये.. … बढ़िया लिखते है आप… पछले काफी दिनों से मै जागरण मंच से दूर रहा हु.. इस कारन आपके अन्य लेख नहीं पढ़ पाया.. समय मिलते ही सभी लेखो को पढूंगा…लिखते रहे.. शुभकामनाये..

    jlsingh के द्वारा
    February 12, 2011

    निखिल जी मैं आपके विचारों से सहमत हूँ.प्रेम मात्र शरीर से नहीं आत्मा या पूरी श्रृष्टि के साथ की जा सकती हा. तभी ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का मंत्र सिद्ध हो सकता है..आपके सुन्दर विचारों के लिए धन्यवाद्!.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 12, 2011

    भ्राता निखिल जी! सही कहा आपने, प्रेम चिरस्थाई वही हो सकता है जो तन से नहीं बल्कि मन से किया गया हो! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 10, 2011

दीपक जी नमस्कार,जहाँ त्याग है वहां सब कुछ है और वहीँ प्यार है,धन्यवाद!

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    धर्मेश जी! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

RajniThakur के द्वारा
February 10, 2011

दीपक जी, सच्चे प्रेम को परिभाषित करती अच्छी पोस्ट …कांटेस्ट हेतु शुभकामनायें.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    रजनी जी! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! दीपक

rajkamal के द्वारा
February 10, 2011

दीपक भाई नमस्कार ! अच्छा लगा यह जानकर कि आप भी मेरी तरह अहंकार रहित ईमानदार प्यार के हिमायती है

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    मुझे भी अच्छा लगा राजकमल जी! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 10, 2011

यूं तो दुनिया मे अनेक लोगों को प्यार मिल जाता है, अनेकों के बगीचों मे प्यार के फूल खिल जाते हैं| पर दुनिया मे सबसे भाग्यशाली वही होता है, जिसे सच्चा प्यार मिलता है| बढ़िया रचना ……. दीपक भाई……… हार्दिक बधाई…..

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    भ्राता पीयूष जी! आपको मेरे विचार पसंद आए! इसकेलिए बहुत बहुत धन्यवाद! और आपकी प्रतिकृया के लिए भी! दीपक

rajeev dubey के द्वारा
February 10, 2011

सुब्दर विचार हैं आपके…शुभकामनायें

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    मित्रवर राजीव जी! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

rameshbajpai के द्वारा
February 10, 2011

दीपक जी सच कहा आपने सबसे भाग्यशाली वाही होता है ,जिसे सच्चा प्यार मिलता है | अच्छी पोस्ट , बधाई

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    महोदय जी! आपकी बहुमूल्य प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

आर.एन. शाही के द्वारा
February 10, 2011

दीपक जी, प्रेम का बहुत ही सुन्दर विश्लेषण । यह भी ठीक है कि प्यार को किसी एक परिभाषा के तहत नहीं बांधा जा सकता । बधाई ।

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 10, 2011

    अदरणीय शाही जी! आपको मेरे विचार पसंद आए! इसकेलिए बहुत बहुत धन्यवाद! और आपकी प्रतिकृया के लिए भी!

R K KHURANA के द्वारा
February 9, 2011

प्रिय दीपक जी, बहुत ही अच्छा लेख ! मेरी बधाई आर के खुराना

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    आदरणीय खुराना जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! दीपक

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 9, 2011

बहुत अच्छी रचना दीपक जी|

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    वाहिद जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! दीपक

deepak pandey के द्वारा
February 9, 2011

सार्थक रचना के लिए बधाई , दीपकजी .

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    दीपक जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! दीपक

allrounder के द्वारा
February 9, 2011

दीपक जी, एक बेहतरीन लेख पर बधाई, और प्रतियोगिता के लिए बधाई !

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    सचिन जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

Preeti Mishra के द्वारा
February 9, 2011

दीपकजी आजकी दुनिया में सच्चा प्यार मिलना बहुत कठिन है. जिसे यह अमूल्य दौलत मिल जाये वह बहुत भाग्यशाली होता है. अच्छी रचना बधाई.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    प्रीति जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! दीपक

February 9, 2011

दीपक भाई, प्रेम की सार्थकता का बड़ा अच्छा विश्लेषण किया है.

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    राजेन्द्र जी! आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 9, 2011

श्री दीपक शाहू जी, आपकी एक बात मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं आई…आपने ये कैसे कह दिया की पहली नजर का प्यार सेक्सुअल अट्रेक्सन है….भइया जिसको प्यार नहीं सेक्स की जरूरत है वो तो पहली और दूसरी मुलाक़ात का मुहताज नहीं..पहली नजर में ही जब कोई अपना-अपना सा लगे…ऐसा लगे की यार ये तो मेरा कोई पुराना बिछड़ा दोस्त लगता है..या यूँ कहे की पहली नजर में ही हम जिसको पसंद क्र बैठते है वो ही तो असली प्यार है.. अगर आपको मेरी बात पसंद न आई हो तो क्षमा कीजिएगा… शुभकामनाओं सहित.. आकाश तिवारी http://aakashtiwaary.jagranjunction.com

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    मित्रवर आकाश जी माफ करना, पर शायद अपने मेरा ब्लॉग पूरा ठीक से पढ़ा नहीं! जहां तक मेरा विचार है किसी को पहली नज़र मे हम केवल उसकी बाह्य सुंदरता को ही देख सकते है नकि उसकी भावनाओं व विचारों को!  आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! दीपक

vinitashukla के द्वारा
February 9, 2011

सही कहा आपने. सच्चा प्रेम तो आत्मा का आत्मा से होता है. प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएं .

    Deepak Sahu के द्वारा
    February 9, 2011

    विनीता जी!  आपकी प्रतिकृया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!


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